बीबीसी न्यूज़ हिंदी की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति से जुड़ा साल 2023 का एक क़ानून इन दिनों विवादों में है। मतदाता सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (एसआईआर) की प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोपों के चलते पिछले कई हफ़्तों से उनके इस्तीफ़े की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।

विपक्ष का विरोध और ‘जन महाभियोग’
शनिवार को विपक्ष के सांसदों ने ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ एक अनौपचारिक ‘जन महाभियोग’ प्रस्ताव पारित किया। विपक्ष ने उन पर पक्षपाती रवैया अपनाने का आरोप लगाया है। ये आरोप विपक्ष के दावे हैं और इन्हें अदालत में परखा जाना बाक़ी है।
2023 के क़ानून पर सवाल क्यों?
दिसंबर 2023 में बने इस क़ानून के तहत ज्ञानेश कुमार को मार्च 2024 में चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। उनके साथ सुखबीर सिंह संधु को भी चुनाव आयुक्त बनाया गया था। इस नियुक्ति की प्रक्रिया की जड़ मार्च 2023 के सुप्रीम कोर्ट के अनूप बरनवाल मामले के फ़ैसले में है। उस फ़ैसले में अदालत ने कहा था कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के लिए नियुक्ति प्रक्रिया को कार्यपालिका के एकाधिकार से मुक्त रखना ज़रूरी है।
अदालत ने अंतरिम व्यवस्था दी थी कि जब तक संसद क़ानून नहीं बनाती, नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के चीफ़ जस्टिस की एक समिति की सिफ़ारिश पर होगी। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 2023 के क़ानून के तहत बनी चयन समिति में सरकार का बहुमत है, जिससे नियुक्तियों में कार्यपालिका का प्रभाव बना रहता है। उनका तर्क है कि यह अनूप बरनवाल मामले के फ़ैसले की भावना के विपरीत है।
साल 2024 में ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधु को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली इसी समिति ने चुना था। समिति में केंद्रीय मंत्री अमित शाह और लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी शामिल थे। अधीर रंजन चौधरी ने कहा था कि उन्होंने इन नियुक्तियों पर अपनी असहमति दर्ज कराई थी। ज्ञानेश कुमार ने 19 फ़रवरी 2025 को मुख्य चुनाव आयुक्त का पदभार संभाला। उसी दिन विवेक जोशी की भी चुनाव आयुक्त के तौर पर नियुक्ति हुई। वे इस क़ानून के तहत नियुक्त होने वाले पहले मुख्य चुनाव आयुक्त हैं।
पूर्व लोकसभा महासचिव और संवैधानिक मामलों के जानकार पीडीटी आचारी ने बीबीसी से बातचीत में इस क़ानून की दो बड़ी दिक़्क़तें बताईं। उनके अनुसार, पहली यह कि सीईसी और चुनाव आयुक्तों को चुनने वाला पैनल पहले से सरकार के पक्ष में झुका हुआ है। दूसरी यह कि इसमें इन अधिकारियों को किसी भी दीवानी या आपराधिक मामले से आजीवन छूट दी गई है। उनका कहना है कि राष्ट्रपति को भी पद पर रहते समय ही ऐसी छूट मिलती है, आजीवन नहीं। उनकी राय में इस क़ानून को रद्द किया जाना चाहिए, ख़ासकर इन दोनों प्रावधानों को।
महाभियोग की प्रक्रिया और अदालत में लंबित याचिका
पीडीटी आचारी के अनुसार, फ़िलहाल ज्ञानेश कुमार को महाभियोग से हटाया जाना आसान नहीं लगता। वे कहते हैं कि अगर वे ख़ुद इस्तीफ़ा दें, तो स्थिति अलग होगी। मुख्य चुनाव आयुक्त को भी जजेज़ इन्क्वायरी एक्ट के तहत उसी तरह हटाया जा सकता है, जैसे किसी जज को हटाया जाता है। इसके लिए लोकसभा के कम से कम 100 या राज्यसभा के कम से कम 50 सदस्यों को नोटिस देना होता है। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति प्रस्ताव पर विचार करते हैं और उसे स्वीकार या ख़ारिज कर सकते हैं।
विपक्ष ने दो बार इस प्रक्रिया को शुरू करने की कोशिश की है। पहले प्रयास के नोटिस लोकसभा और राज्यसभा, दोनों ने अप्रैल में ख़ारिज कर दिए थे। दूसरे प्रयास के नोटिस राज्यसभा में अब भी लंबित हैं। आचारी के मुताबिक़, अगर अध्यक्ष या सभापति प्रस्ताव स्वीकार न करें, तो सांसद इस फ़ैसले को अदालत में चुनौती दे सकते हैं।
2023 के क़ानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका क़रीब ढाई साल से सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। पूर्व जज संजय किशन कौल के अनुसार, ये याचिकाएं जनवरी 2024 में क़ानून लागू होने के कुछ ही दिनों में दायर की गई थीं। 21 मार्च 2024 को अदालत ने इन पर स्टे देने से इनकार कर दिया था, यह कहते हुए कि आम चुनावों से ठीक पहले ऐसा करने से अव्यवस्था पैदा हो सकती है। इसके बाद मामला 2025 में कई बार सूचीबद्ध होकर स्थगित होता रहा। निर्वाचन आयोग की संरचना से जुड़े इतने अहम मामले में देरी पर भी सवाल उठ रहे हैं।
स्रोत: BBC News Hindi
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